गुरूग्राम में रंगबिरंगा सरस आजीविका मेला 2026

 

गुरूग्राम की शीशे की इमारतों पर सूरज की सुनहरी किरणें शाम ढलने के साथ ही सुर्ख पड़ती जाती हैं। इस साइबर सिटी के सेक्टर 29 में लीजर वैली पार्क के गेट एक सतरंगी दुनिया में खुलते हैं। यह दुनिया इस्पात और शीशे की चमक से नहीं, बल्कि हाथ से बुने रेशम और बांस की कारीगरी से रोशन है। यहां मसालों की खुशबू तथा गीतों और कहानियों का राज है। अपने दफ्तरों से निकल कर पार्क के सामने से गुजरने वालों के पैरों की रफ्तार  खुद-ब-खुद धीमी पड़ जाती है। शहर ने कॉरपोरेट धुन पर थिरकना कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया है। अब वह लोक संगीत की लहरों पर झूमता हुआ अलग-अलग इलाकों के ताजा व्यंजनों की खुशबूओं से सराबोर है। सरस आजीविका मेला 2026 ने इस शहर को ग्रामीण भारत के जीवंत कैनवस में तब्दील कर दिया है। 10 से 26 फरवरी तक चलने वाला यह राष्ट्रीय मेला नुमाइश के बजाय समूचे देश के सफर जैसा लगता है। इसने 28 राज्यों से स्वयं सहायता समूहों की 900 ये ज्यादा महिला उद्यमियों के हाथों के हुनर को पार्क की चौहद्दी में बिखेर दिया है।


राज्यों के पवेलियन में लगे 450 से ज़्यादा स्टॉल के साथ, इस मेले को “मिनी इंडिया” कहा जाता है,  जिसमें  स्थानीय परंपराओं और शिल्प कौशल में रचे-बसे क्षेत्रीय उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है। यहाँ आने वाले दर्शकों को कश्मीर की पश्मीना शॉल, तमिलनाडु के रेशमी वस्त्र, राजस्थान की कढ़ाई वाली पारंपरिक पोशाकें और असम के बांस शिल्प के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यंजन, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक प्रदर्शन देखने का अवसर मिला। अपनी सांस्कृतिक जीवंतता के अलावा, यह मेला आजीविका के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने वाले फ्रेमवर्क के भीतर संरचित बाजार संपर्क मॉडल का उदाहरण पेश करता है। यह दर्शाता है कि कैसे शहरी क्षेत्रों में आयोजित ये प्रदर्शनियाँ आय को बढ़ा सकती हैं, उपभोक्ताओं के साथ सीधा संपर्क स्थापित कर सकती हैं, स्वयं सहायता समूह के उत्पादों की ब्रांडिंग को मजबूत बनाती हैं और बाजार में महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यमों को बढ़ावा देती हैं।


नमोहक शिल्प और वस्त्रों के अलावा, यह मेला संस्थागत सहयोग और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की कहानियों को भी सबके सामने लाता है। एक स्टाल पर, असम के मूंगा रेशम की विशिष्ट सुनहरी चमक अनायास ही ध्यान खींच लेती है। जीआई टैग वाला मूंगा सिल्क खास तौर पर असम में बनाया जाता है और  लंबे समय से चली आ रही हथकरघा की परंपरा को दर्शाता है। लखीमपुर जिले से आई नजीत्रा दीदी, 'हरियाणी मिसिंग गांव महिला स्वयं सहायता समूह' का प्रतिनिधित्व करते हुए इस स्टाल को चला रही हैं। 1984 से अब तक, उन्होंने 25,000 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित किया है और उन्हें 'आर्टिसन कार्ड' (शिल्पकार कार्ड) तथा औपचारिक बाजार संपर्क करने में उनकी सहायता की है। उन्होंने ग्रामीण महिला शिल्पकारों को प्रशिक्षित करने में एक उत्प्रेरक भूमिका निभाई है, जहाँ उन्होंने महिलाओं को न केवल बुनाई का हुनर ​​सिखाया है, बल्कि उन्हें उत्पाद की कीमत तय करने, उपभोक्ता की पसंद और बाजार की बारीकियां भी सिखाईं। जिन कारीगरों का उन्होंने मार्गदर्शन किया, उनमें से कई अपने गांवों से बहुत कम बाहर निकलते हैं और उन्हें गाँव के बाहर की भाषा की भी कम जानकारी होती है। इसलिए, उनके साथ रहकर, वह उनके लिए बातचीत करके, मोल-भाव करने और बाजार तक पहुंच को सुलभ बना रही हैं।


30,000 से 70,000 रुपये तक कीमत वाली हाथ से बुनी मूंगा सिल्क साड़ियों को दिखाते हुए, वह बताती हैं कि मशीन से बने उत्पादों के बजाय असली हथकरघा उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की मांग काफी बढ़ी है। मेले के शुरुआती दिनों में ही, उनके स्टॉल पर 3 लाख रुपये से ज़्यादा की बिक्री हुई। इस तरह यहाँ प्रदर्शित मूंगा रेशम केवल एक वस्त्र मात्र नहीं है, बल्कि यह मार्गदर्शन, मिलकर काम करने और पारंपरिक शिल्प अर्थव्यवस्था को फिर से ज़िंदा करने का मिला-जुला नतीजा है। (PIB )

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